पूरब मे सूरज ने छेड़ी
जब किरणों की शहनाई
चमक उठा सिंदूर गगन पे
पश्चिम तक लाली छाई
दुल्हन चली
पहन चली
दुल्हन चली
पहन चली
तीन रंग की चोली
बाहों में लहराये गंगा जमुना
देख के दुनिया डोली
दुल्हन चली
पहन चली
तीन रंग की चोली
ताज महल की ताज़ा है सूरत
चलती फिरती अजंता की मूरत
मेल मिलाप की मेहंदी रचाये
बलिदनों की रंगोली
दुल्हन चली
पहन चली
तीन रंग की चोली
मुख चमके ज्यों हिमालय की चोटी
हो न पड़ोसि की नीयत खोटी
ओ घर वालो ज़रा इसको संभालो
ये तो है बड़ी भोली
दुल्हन चली
पहन चली
तीन रंग की चोली
और सजेगी अभी और संवरेगी
चढ़ती उमरिया है
और निखरेगी
अपनी आज़ादी की दुल्हनिया
बीस के ऊपर हो ली
दुल्हन चली
पहन चली
तीन रंग की चोली
देश प्रेम ही आज़ादी की
दुल्हनिया का वर है
इस अलबेली दुल्हनिया का
सिंदूर सुहाग अमर है
माता है कस्तूर्बा जैसी
बबुल गांधी जैसे
चाचा इस्के नेहरू शास्त्री
डरें न दुशमन कैसे
वीर शिवजी जैसे वीर व
लक्षमी भाई बहिना
लक्षमन जिसके बोस भगत सिंह
उसका फिर क्या कहना
जिसके लिये जवान बहा सकते हैं खून की गंगा
आगे पीछे तीनो सेना
लेके चले तिरंगा
सेना चलती है लेके तिरंगा
हों कोई हम प्रांत के बासी
हों कोई भी भाषा भाषी
सबसे पहले हैं भारत वासी...